
| बलाढ्य राजा जयसेन, त्याच्या बहिणीचा, अवंतिकेचा विवाह राजा इंद्रजीताशी ठरवतो. इंद्रजीतला इंदुमती आवडते तर अवंतिकेला शूरसेन. शूरसेन युद्धामध्ये गुंतल्याने अवंतिकेला भेटण्यासाठी आणि विवाहाची परवानगी घेण्यासाठी येऊ शकत नाही. शूरसेन इंदुमतीला दूत म्हणून अवंतिकेकडे पाठवतो. अवंतिका शूरसेनाला आपले हरण करायला सांगते. अल्पशा नाट्यानंतर अवंतिकेला आणि इंदुमतीला मनाजोगता जोडीदार मिळतो. कर्म-धर्म संयोगाने सर्वजण एकत्र येतात, जयसेनाची समजूत काढून विवाहाला मान्यता मिळवतात. |
| राजा जयसेन: | बलाढ्य त्रिवर्ण राज्याचा राजा. पराक्रमी, शीघ्रकोपी, वर्चस्व गाजवणारा. |
| मंत्री विप्लव: | राजा जयसेनाचा मंत्री. |
| राजा इंद्रजीत: | कणव राज्याचा राजा, पराक्रमी, उत्तम प्रशासक, देखणा, समजुतदारपणामध्ये उजवा. |
| मंत्री वृषकेतु: | राजा इंद्रजीताचा मंत्री. |
| राजा शूरसेन: | अजेय राज्याचा राजा, पराक्रमी, महत्त्वाकांक्षी, शौर्यामध्ये उजवा. |
| राजा सौमित्र: | सुमित्र राज्याचा राजा, पराक्रमी, उदार मतांचा. |
| राजकन्या अवंतिका: | राजा जयसेनाची धाकटी बहीण. |
| राजकन्या इंदुमती: | राजा सौमित्राची धाकटी बहीण. पराक्रमी, युद्धात भाग घेणारी. |
| नांदी |
| स्मरूनी तुज नटवरा, ईश्वरा, |
| येई बळ ते कार्यारंभा। |
| मग विघ्नेश तो तारी कार्या, |
| नेई अवचित पैलतीरा। |
| आशिष देती सर्व देवता, |
| योगेश्वर तो पाठीराखा।। |
| दैव करविते, दैव घडविते, |
| दैव असे सर्वव्यापी। |
| न करिता प्रयत्न मानवे, |
| काही सुद्धा घडत नाही।। |
| विनासायास न मिळे काही, |
| अग्निपरिक्षेचा घाट तो। |
| प्रयत्नांची कास न सुटो ही, |
| प्रयत्नांती परमेश्वर तो।। |
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